राजा और दो मित्र की अनोखी कहानी
बहुत समय पहले की बात है। एक सुंदर और समृद्ध राज्य था जिसका राजा न्यायप्रिय और दयालु था। उसके राज्य में हर कोई खुशहाल था। लेकिन राजा के पास कोई संतान नहीं थी, जिससे वह बहुत दुखी रहता था। एक दिन राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा, "मंत्री जी, मुझे बहुत दुख होता है कि मेरी कोई संतान नहीं है। मेरे बाद इस राज्य का वारिस कौन बनेगा?"
मंत्री ने राजा को सुझाव दिया, "महाराज, आप राज्य में एक प्रतियोगिता रखिए और जो इस प्रतियोगिता में विजयी होगा, उसे आप अपना वारिस बना सकते हैं।"
राजा को यह सुझाव अच्छा लगा। उन्होंने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि एक कठिन परीक्षा रखी जाएगी और जो इसमें सफल होगा, उसे राजा का वारिस बनाया जाएगा। परीक्षा में भाग लेने के लिए दो युवक, मोहन और सोहन, आगे आए। वे दोनों बचपन के मित्र थे, परन्तु उनके स्वभाव में बहुत अंतर था। मोहन नेक दिल और ईमानदार था, जबकि सोहन चालाक और लालची था।
पहली परीक्षा के अनुसार, दोनों युवकों को एक जंगल में भेजा गया, जहाँ उन्हें खुद के लिए खाना ढूंढना था। मोहन ने जंगल में लगे फलों और सब्जियों से अपनी भूख मिटाई और अपने साथ थोड़ा-बहुत खाना बचाकर भी रखा। दूसरी ओर, सोहन ने कुछ जानवरों का शिकार किया और बिना सोचे-समझे खाना खाने लगा।
कुछ दिन बाद, दोनों युवक राजा के पास लौटे। राजा ने देखा कि मोहन के पास कुछ खाना बचा हुआ है, जबकि सोहन खाली हाथ था। राजा ने दोनों की समझ और दूरदर्शिता की प्रशंसा की, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
दूसरी परीक्षा में, दोनों को एक कठिनाई का सामना करना था। राजा ने उन्हें एक गहरी घाटी के पास ले जाकर कहा, "तुम दोनों को इस घाटी को पार करके दूसरी ओर जाना है। लेकिन ध्यान रहे, इस घाटी में कई जंगली जानवर भी रहते हैं।"
मोहन और सोहन ने सोचा कि यह कार्य बहुत कठिन है। लेकिन मोहन ने अपनी हिम्मत बनाए रखी। उसने पेड़ों की जड़ों और मजबूत लताओं की मदद से एक पुल तैयार किया और धीरे-धीरे घाटी पार करने लगा। उसने यह भी सुनिश्चित किया कि पुल सुरक्षित हो ताकि सोहन भी उसे पार कर सके।
जब मोहन घाटी पार कर चुका, तो उसने सोहन को आवाज़ लगाई। लेकिन सोहन ने सोचा, "मोहन को क्या फर्क पड़ेगा अगर मैं उसकी मदद न करूं? मैं अपने तरीके से पार कर लूंगा।"
सोहन ने लापरवाही से घाटी पार करने का प्रयास किया और आधे रास्ते में ही फिसलने लगा। मोहन ने उसे बचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया और सोहन को सुरक्षित खींच लिया। सोहन को एहसास हुआ कि उसके लालच और चालाकी से उसे कुछ हासिल नहीं हुआ।
अंत में, दोनों राजा के पास लौटे। राजा ने उनकी कहानियां सुनीं और उनकी हिम्मत और सोच को समझा। उन्होंने मोहन को अपनी नेकदिली और समझदारी के कारण अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया।
सीख: नेकदिल और ईमानदार व्यक्ति ही सच्ची जीत हासिल करता है, जबकि चालाकी और लालच से
कुछ भी नहीं मिलता।

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